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इस तरह करें मूली की खेती, कम समय होगी लाखों की कमाई

DeHaat | देहात

19-07-2021

जड़ वाली सब्जियों में मूली की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसका सेवन हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। इसका सबसे अधिक उपयोग सलाद के तौर पर किया जाता है। इसके अलावा इससे अंचार, सब्जी, पराठे, आदि कई स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, पंजाब, असम में इसकी खेती प्रमुखता से की जाती है। अन्य फसलों के साथ सहफसली खेती के तौर भी इसकी खेती की जा सकती है। आइए इस पोस्ट के माध्यम से मूली की खेती से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करें।

मूली की खेती का उपयुक्त समय

  • पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई मार्च से अगस्त महीने में की जाती है।

  • मैदानी क्षेत्रों में इसकी खेती अगस्त-सितंबर महीने में की जाती है।

  • इसके अलावा मैदानी क्षेत्रों में जनवरी-फरवरी महीने में भी इसकी बुवाई की जा सकती है।

उपयुक्त मिट्टी एवं जलवायु

  • मूली की बेहतर पैदावार के लिए भुरभुरी मिट्टी एवं रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है।

  • मिट्टी का पी.एच स्तर 5.5 से 6.8 होना चाहिए।

  • उच्च गुणवत्ता की फसल प्राप्त करने के लिए ठंडे जलवायु की आवश्यकता होती है।

  • 10-15 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पौधों एवं जड़ों के विकास के लिए उपयुक्त है।

  • इसके पौधे कम से कम 4 डिग्री और अधिक से अधिक 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान सहन कर सकते हैं।

बीज की मात्रा एवं बीज उपचारित करने की विधि

  • बीज की मात्रा मूली की विभिन्न किस्मों पर निर्भर करती है।

  • सामान्यतौर पर प्रति एकड़ खेत में मूली की खेती करने के लिए 2 से 4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

  • बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2.5 ग्राम थीरम से उपचारित करें।

खेत तैयार करने की विधि

  • मूली एक जड़ वाली फसल है। जड़ों के अच्छे विकास के लिए भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है।

  • मिट्टी को भुरभुरी बनाने के लिए सबसे पहले एक बार गहरी जुताई करें।

  • इसके बाद खेत में 3 से 4 बार हल्की जुताई करें।

  • आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ खेत में 80 से 100 क्विंटल गोबर की खाद मिलाएं।

  • इसके अलावा प्रति एकड़ खेत में 5 से 10 टन रूड़ी की खाद मिलाएं।

  • इसके साथ ही प्रति एकड़ खेत में 170 किलोग्राम यूरिया, 96 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 40 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश मिलाएं।

  • खेत की जुताई के बाद खेत में क्यारियां तैयार करें।

  • करीब 3 से 4 सेंटीमीटर की गहराई में बीज की बुवाई करें।

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